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ज़ीशान नियाज़ी

1974 | कानपुर, भारत

ज़ीशान नियाज़ी

ग़ज़ल 14

अशआर 15

मुझ से नाराज़ भी नहीं है वो

और उस को मना रहा हूँ मैं

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उस ने इतना किया नज़र-अंदाज़

सब की नज़रों में गए हैं हम

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मिरा साया भी मुझ से दूर है और तेरी यादें भी

मैं अब इस से ज़ियादा और तन्हा हो नहीं सकता

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एक चेहरा तिरा देखने के लिए

कितने चेहरों से हम को गुज़रना पड़ा

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पहले रुख़्सत हुई चमन से बहार

और अब ग़ैरत-ए-चमन भी गई

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Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI