ज़ुहूर नज़र

ग़ज़ल 15

नज़्म 6

अशआर 12

सुनते हैं चमकता है वो चाँद अब भी सर-ए-बाम

हसरत है कि बस एक नज़र देख लें हम भी

वो भी शायद रो पड़े वीरान काग़ज़ देख कर

मैं ने उस को आख़िरी ख़त में लिखा कुछ भी नहीं

सो सका हूँ शब जाग कर गुज़ारी है

अजीब दिन हैं सुकूँ है बे-क़रारी है

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वो जिसे सारे ज़माने ने कहा मेरा रक़ीब

मैं ने उस को हम-सफ़र जाना कि तू उस की भी थी

लुट गया है सफ़र में जो कुछ था

पास अपने मकान तक भी नहीं

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI