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नज़्म
हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं
मबादा हो कोई ज़ालिम तिरा गरेबाँ-गीर
लहू के दाग़ तू दामन से धो, हुआ सो हुआ''
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
ग़ज़ल
रेत भरी है इन आँखों में आँसू से तुम धो लेना
कोई सूखा पेड़ मिले तो उस से लिपट के रो लेना
बशीर बद्र
नज़्म
जश्न-ए-ग़ालिब
'ग़ालिब' जिसे कहते हैं उर्दू ही का शाइर था
उर्दू पे सितम ढा कर 'ग़ालिब' पे करम क्यूँ है



