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हास्य
जो पूछा मुझ से मुश्त-ए-ख़ाक को तुम क्या समझते हो
तो फ़रमाया कि इस्तिंजे का मैं ढेला समझता हूँ
बूम मेरठी
ग़ज़ल
जहाँ चाहे लगे जिस दिल को चाहे चूर कर डाले
ज़बाँ से फेंक मारा बात थी नासेह कि ढेला था
शाद अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
उधर वो थे कि थी इक दौलत-ए-बेदार पास उन के
इधर हम थे कि अपनी जेब में पैसा न ढेला था
हमीद जालंधरी
रेख़्ती
अजी पत्थर पड़ें ऐसी हँसी पर नेकी-ख़ानम की
लगा है ऊंही कैसा आ के मेरी आँख में ढेला
मीर यार अली जान
कुल्लियात
शैख़ मत रू-कश हो मस्तों का तू इस जुब्बे उपर
लेते इस्तिंजे को ढेला तेरी टल जाती है नाफ़
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
उसे हम दिल नहीं मिट्टी का इक ढेला समझते हैं
कि जब तक रंज-ओ-ग़म सहने के वो क़ाबिल न बन जाए