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ग़ज़ल
नीम के पत्तों का ज़ख़्मों को धुआँ दे दीजिए
फिर मिरी आँखों को पहरे-दारियाँ दे दीजिए
पी पी श्रीवास्तव रिंद
कुल्लियात
दिल अजब चर्चे की जागा थी सो वीराना हुआ
जोश-ए-ग़म से जी जो बौलाया सो दीवाना हुआ
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
मंज़िलों के बा'द दिल उस राज़ का महरम हुआ
दर-हक़ीक़त वो ख़ुशी थी नाम जिस का ग़म हुआ
मानी नागपुरी
ग़ज़ल
कशाँ कशाँ लिए जाता है कू-ए-यार मुझे
मैं क्या करूँ नहीं दिल पर जो इख़्तियार मुझे
हंस राज सचदेव 'हज़ीं'
ग़ज़ल
ये क्या तिलिस्म है मैं उस को देख भी न सकूँ
कि जिस के जल्वों से दामान-ए-चश्म भर जाए
मुशफ़िक़ ख़्वाजा
ग़ज़ल
मैं पा-शिकस्ता कहाँ तिफ़्ल-ए-नय सवार कहाँ
फिर उस की गर्द कहाँ और मिरा ग़ुबार कहाँ
