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ग़ज़ल
दिल के गुल-दाँ में सजाओ ताज़ा ज़ख़्मों के गुलाब
और फिर सीने को इक बाग़-ए-वफ़ा का नाम दो
मुसर्रत जबीं ज़ेबा
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ग़ज़ल
नस-नस में रच गई हैं तो 'ज़ेबा' हो क्या भला
कैसे दिल-ओ-दिमाग़ से जाएँ मोहब्बतें
मुसर्रत जबीं ज़ेबा
ग़ज़ल
ये दुनिया बाग़-ए-ज़ेबा है मगर चश्म-ए-तमाशा में
सर-ए-शाख़-ए-तमन्ना फूल भी दो-चार होते हैं
सय्यद अमीन अशरफ़
ग़ज़ल
फूलों से अब न रब्त न काँटों से एहतियात
'ज़ेबा' बदल रहे हैं ब-तदरीज-ए-वाक़िआ'त
इफ़्फ़त ज़ेबा काकोरवी
ग़ज़ल
'रज़ा' कब से यही फ़रियाद है बाग़-ए-तमन्ना की
मुझे लूटे चला जाएगा मेरा बाग़बाँ कब तक
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
जिन पे बारिश-ए-गुल है उन का हाल क्या होगा
ज़ख़्म खाने वाले भी बाग़ बाग़ हैं यारो
फ़ज़ा इब्न-ए-फ़ैज़ी
ग़ज़ल
वा'इज़ तू बाग़-ए-हुस्न की इक बार सैर कर
मुमकिन है दिलकशी में हो ख़ुल्द-ए-बरीं शरीक
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्यूँ जानते हैं सनअत-ओ-हिरफ़त को बाग़-ए-ख़ुल्द
ग़ैरों की हम निगाह में हैं ख़ार आज-कल