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ग़ज़ल
अब तो छू कर देख न मुझ को अपनी ठंडी राख हूँ मैं
मुमकिन है फिर शोले भड़कें तेरे हाथ लगाने से
मुबारक शमीम
ग़ज़ल
जो गुल हों तो अंधेरा हो जो भड़कें आग लग जाए
भरोसा कर लिया हम ने कुछ ऐसे ही शरारों पर
रशीद ख़ाँ रज़ा
दुआ (मुनाजात)
या इलाही गर्मी-ए-महशर से जब भड़कें बदन
दामन-ए-महबूब की ठंडी हवा का साथ हो
अहमद रज़ा खां बरेलवी
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ग़ज़ल
मैं तो इस ख़ाना-बदोशी में भी ख़ुश हूँ लेकिन
अगली नस्लें तो न भटकें उन्हें घर भी देना
मेराज फ़ैज़ाबादी
नज़्म
इस बस्ती के इक कूचे में
इक रोज़ मगर बरखा-रुत में वो भादों थी या सावन था
दीवार पे बीच समुंदर के ये देखने वालों ने देखा
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
जो आग लगाई थी तुम ने उस को तो बुझाया अश्कों ने
जो अश्कों ने भड़काई है उस आग को ठंडा कौन करे
मुईन अहसन जज़्बी
ग़ज़ल
गर मोहब्बत है तो वो मुझ से फिरेगा न कभी
ग़म नहीं है मुझे ग़म्माज़ को भड़काने दो
