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ग़ज़ल
दम-ए-सुब्ह-ए-नौ-बहाराँ जो कली चमन में चटकी
तो गुमाँ हुआ कि जैसे मुझे आप ने पुकारा
फ़ारूक़ बाँसपारी
नज़्म
'इक़बाल'
सोने वालों को पयाम-ए-सुब्ह-ए-नौ देती हुई
ख़्वाब की दुनिया उठी अंगड़ाइयाँ लेती हुई
मयकश अकबराबादी
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ग़ज़ल
दम-ए-सुब्ह आँधियों ने जिन्हें रख दिया मसल के
वही नन्हे नन्हे पौदे थे घने दरख़्त कल के
बासिर सुल्तान काज़मी
ग़ज़ल
उन की रुख़्सत इक क़यामत थी दम-ए-इज़हार-ए-सुब्ह
शाम तक बचता नज़र आता नहीं बीमार-ए-सुब्ह
मुंशी नौबत राय नज़र लखनवी
नज़्म
या बाग़ में खिलता है दम-ए-सुब्ह गुल-ए-तर
या बाग़ में खिलता है दम-ए-सुब्ह गुल-ए-तर
क्या क्या उसे होते नहीं ए'ज़ाज़ मयस्सर
चकबस्त बृज नारायण
ग़ज़ल
सुब्ह-ए-नौ मग़रिब में है बेदार बेदारों के साथ
और हम गर्दिश में हैं बे-नूर सय्यारों के साथ
यूसुफ़ ज़फ़र
ग़ज़ल
मंज़र-ए-सुब्ह-ए-बहाराँ नहीं देखा जाता
चाक-दामान-ए-गुलिस्ताँ नहीं देखा जाता
सूफ़ी ज़मज़म बिजनोरी
ग़ज़ल
सुब्ह-ए-नौ लाती है हर शाम तुम्हें क्या मा'लूम
ज़ख़्म ख़ुशियों के हैं पैग़ाम तुम्हें क्या मा'लूम
फ़ैज़ुल हसन ख़्याल
ग़ज़ल
ऐ जवानाँ नौ-बहाराँ में क़दह-नोशी करो
गुल-बदन साक़ी सेती हर शब हम-आग़ोशी करो