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ग़ज़ल
रोया मैं देख मरक़द-ए-मजनूँ को धाड़ मार
थे जा-ए-गुल दरख़्त-ए-मुग़ीलाँ लगे हुए
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
ग़ज़ल
नुमूद-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ है बाग़बाँ को पसंद
ज़मीन-ए-लाला-ओ-गुल वर्ना है बहुत ज़रख़ेज़
इक़बाल माहिर
नअत
बिछ गई है चादर-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ दश्त में
तेरे वहशी के लिए सामान-ए-रहमत हो गया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
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ग़ज़ल
मेजर ने जुनूँ की है ये तय्यार की पलटन
हाँ देख सफ़-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलान समझ कर
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
ग़ज़ल
दिल को जिस वक़्त ख़याल सफ़-ए-मिज़्गाँ होगा
पा-ए-जाँ में ख़लिश-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ होगा
मुंशी देबी प्रसाद सहर बदायुनी
ग़ज़ल
गरेबाँ हाथ में है पाँव में सहरा का दामाँ है
बस अब पाँव हैं अपने और सर-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ है
हातिम अली मेहर
ग़ज़ल
बयाबाँ मर्ग है मजनून-ए-ख़ाक-आलूदा-तन किस का
सिए है सोज़न-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ तू कफ़न किस का
शाह नसीर
ग़ज़ल
मुबारक बादिया-गर्दो बहार आई बयाबाँ में
नुमूद-ए-रंग-ए-गुल है हर सर-ए-ख़ार-ए-मुग़ीलाँ में
साइल देहलवी
नज़्म
कराची का ट्रैफ़िक
मुब्तला पेच में हैं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ की तरह
दर पे लटके हैं बशर ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की तरह
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
ग़ज़ल
आँखें हैं या ख़ार-ए-मुग़ीलाँ चेहरा है या सहरा है
लफ़्ज़ बहुत नायाब हैं प्यारे दर्द मगर नायाब नहीं
फ़ैसल अज़ीम
ग़ज़ल
वो हम को डराते हैं इक ख़ार-ए-मुग़ीलाँ से
हम लोग तो फूलों की ज़ंजीर बनाते हैं
डॉ. श्वेता सिंह उमा
ग़ज़ल
बचाओ ठेस से इस को बहुत ये नाज़ुक है
न फूटे ख़ार-ए-मुग़ीलाँ से आबला दिल का
अब्दुल मजीद ख़्वाजा शैदा
ग़ज़ल
कब है महदूद बहारों में नज़र की वुसअ'त
या'नी ये फूल भी हैं ख़ार-ए-मुग़ीलाँ मुझ को