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नज़्म
कभी कभी
इसे किसी के सहारे की आरज़ू भी नहीं
ज़माने भर के दुखों को लगा चुका हूँ गले
साहिर लुधियानवी
ग़ज़ल
बशीर बद्र
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फ़िल्मी गीत
शरीक-ए-ज़िंदगी को क्यों शरीक-ए-ग़म नहीं करते
दुखों को बाँट कर क्यों इन दुखों को कम नहीं करते
राजा मेहदी अली ख़ाँ
ग़ज़ल
मैं किस हवा में उड़ूँ किस फ़ज़ा में लहराऊँ
दुखों के जाल हर इक सू बिछा गया इक शख़्स
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
कैसे दुखों के मौसम आए कैसी आग लगी यारो
अब सहराओं से लाते हैं फूलों के नज़राने लोग
उबैदुल्लाह अलीम
ग़ज़ल
तेज़ हवाएँ आँखों में तो रेत दुखों की भर ही गईं
जलते लम्हे रफ़्ता रफ़्ता दिल को भी झुलसाएँगे
बशर नवाज़
नज़्म
ईद
मगर रुको ज़रा ठहरो ये सिसकियाँ कैसी
ख़ुशी कि रुत में दुखों की ये बदलियाँ कैसी


