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रेख़्ती
आज से फ़िर्नी ओ फ़ालूदा की तय्यारी कर
कल है नौ-चंदी रखेगी मेरी प्यारी रोज़ा
रंगीन सआदत यार ख़ाँ
ग़ज़ल
माह ही बस है हमें गो कि न होवे ख़ुर्शीद
मुर्दा क्यूँ ढूँडते फ़िर्नी की रकाबी होते
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
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ग़ज़ल
आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है
हसरत मोहानी
शेर
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
यूँही बे-सबब न फिरा करो कोई शाम घर में रहा करो
वो ग़ज़ल की सच्ची किताब है उसे चुपके चुपके पढ़ा करो










