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ग़ज़ल
ख़ुश-बख़्त है वो जिस के मुक़द्दर में 'इरम' है
मैं साथ में इक बाग़-ए-इरम ले के चली हूँ
इरुम ज़ेहरा
ग़ज़ल
अपने हाथ में इल्म की शम्अ' 'इरम' ने थामे रक्खी है
मैं तो एक उजाला ले कर दीदा-वर तक आई हूँ


