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ग़ज़ल
मदहत-ए-साक़ी-ए-कौसर तुझ को लिखनी है 'क़लक़'
पहले आब-ए-हौज़-ए-कौसर से नहाना चाहिए
असद अली ख़ान क़लक़
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ग़ज़ल
गँवा चुका है तू साक़ी-ए-हौज़-ए-कौसर को
कि तेरे ज़र्फ़ में अब तक शराब-ए-नाब नहीं
नक़्क़ाश अली बलूच
ग़ज़ल
मुझे है आरज़ू दिल में तिरी चाह-ए-ज़नख़दाँ की
नहीं दरकार हौज़-ए-कौसर ओ आब-ए-ज़ुलाल उस का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
हमारे मय-कदा को छोड़ कर न जा ज़ाहिद
मिलेगा क़तरा न कम-बख़्त हौज़-ए-कौसर पर
पंडित जगमोहन नाथ रैना शौक़
ग़ज़ल
हौज़-ए-कौसर की नहीं चाह-ए-ज़नख़दाँ की क़सम
तिश्ना-ए-शर्बत-ए-दीदार हूँ किन का उन का
सिराज औरंगाबादी
ग़ज़ल
औन अब्बास औन
ग़ज़ल
मैं वो हूँ महशर के प्यासों को पिलाऊँ तो सही
हौज़-ए-कौसर होगा ऐ पीर-ए-मुग़ाँ बाला-ए-सर