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शेर
हफ़्ते में हैं दिन सात मगर सात दिनों में
सिर्फ़ एक ही इतवार है मालूम नहीं क्यूँ
किशन लाल ख़न्दां देहलवी
शेर
दिल में जब से देखता है वो तिरी तस्वीर को
नूर बरसाता है अपनी चश्म-ए-तर से आफ़्ताब
महाराजा सर किशन परसाद शाद
हास्य
उस बुत से मुझे प्यार है मालूम नहीं क्यूँ
और मुझ से उसे ख़ार है मालूम नहीं क्यूँ
किशन लाल ख़न्दां देहलवी
ग़ज़ल
फ़ना कहते हैं किस को मौत से पहले ही मर जाना
बक़ा है नाम किस का अपनी हस्ती से गुज़र जाना
महाराजा सर किशन परसाद शाद
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शेर
तुम्हारे इश्क़-ए-अबरू में हिलाल-ए-ईद की सूरत
हज़ारों उँगलियाँ उट्ठीं जिधर से हो के हम निकले
किशन कुमार वक़ार
ग़ज़ल
आना हो तो आ जाओ बहाना नहीं अच्छा
हर रोज़ का मुझ को ये सताना नहीं अच्छा
महाराजा सर किशन परसाद शाद
शेर
दिल-लगी के वास्ते देहली में है मटिया-महल
कौन जावे ख़ाक उड़ाने मुल्क-ए-बीकानेर को
किशन लाल तालिब देहलवी
ग़ज़ल
मैं समझता हूँ तुझे मेरी वफ़ा याद नहीं
तू समझता है मुझे तेरी जफ़ा याद नहीं












