aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "kulle"
कुल हिंद अल्लामा इक़बाल अदबी मरकज़, भोपाल
पर्काशक
पंडित देवराज देव काले बालवी
लेखक
कुल हिन्द तरवीज तालीम काउंसिल, दिल्ली
कुल भास्कर वर्मा जन्नत देहलवी
कुल हिंद बज़्म-ए-अज़ीज़या अमजदिया बलरामपुर, उत्तर प्रदेश
कुल हिन्द इदारा फ़रोग़ उर्दू
शायर
कुल हिंद उर्दू रिसर्च स्कॉलर्स कौंसिल
गोविंद रामचंद्र काले
औसवाल्ड कुल्पे
कुल हिन्द हिंदी उर्दू संगम लखनऊ
कुल कर्नाटक अंजुमन उर्दू, बैंगलोर
दारुल-इशात कुलहिन्द, हैदराबाद
स्टडी सरकल कुल हिंद मज्लिस तामीर-ए-मिल्लत, हैदराबाद
कुल हिन्द हलक़ा-ए-अदब, ग़ाज़ीपुर
कुल्ले-शय-इन-मुहीत की तक़रीरखट से इंसान के हुए परघट
शान-ए-हक़ आश्कार है तन सेमूजिद-ए-कुल्ल-ए-ख़ैर-ओ-शर है तू
तू सुल्तान साहिब सरीर आमदीअला कुल्ले शयइन क़ादीर आमदी
اور آخر ہندوستان کی دلہن دلی کا دل ۱۷/اپریل ۷۶ء کو جگمگا اٹھا۔ دلی کا یہ دل جدید و قدیم تہذیبوں کا گنگا جمنی سنگم بستی نظام الدین کا علاقہ ہے جہاں ایک طرف عالیشان ماڈرن کوٹھیاں ہیں تو دوسری طرف پرانے طرز کے بنے ہوئے کچے پکے مکانات۔ جہاں...
शाम की ना-समझ हवा पूछ रही है इक पतामौज-ए-हवा-ए-कू-ए-यार कुछ तो मिरा ख़याल भी
चाँद उर्दू शाएरी का एक लोकप्रिय विषय रहा हैI चाँद को उसकी सुंदरता, उसके उज्ज्वल नज़ारे से उसके प्रतिरूप के कारण कसरत से उपयोग में लाया गया हैI शाएर चाँद में अपने माशूक़ की शक्ल भी देखता हैI शाएरों ने बहुत दिलचस्प अंदाज़ में शेर भी लिखे हैं जिनमें चाँद और माहबूब के हुस्न के बीच प्रतिस्पर्धा का तत्व भी मौजूद है।
हवा का ज़िक्र आपको शायरी में बार-बार मिलेगा। हवा का किरदार ही इतना मुख़्तलिफ़-उल-जिहात और मुतनव्वे है कि किसी न किसी सम्त से इस का ज़िक्र आ ही जाता है। कभी वो चराग़ों को बुझाती है तो कभी जीने का इस्तिआरा बन जाती है और कभी ज़रा सी ख़ुनकी लिए हुए सुब्ह की सैर का हासिल बन जाती है। हवा को मौज़ू बनाने वाले अशआर का ये इन्तिख़ाब आप के लिए हाज़िर है।
कूलेکُولے
رک : کولا (۱) کی جمع ، تراکیب میں مستعمل.
cooliecoolie
(उर्दू) क़ुली
cuddlecuddle
गुले
कूल्हेکُولھے
कूल्हा, चूतड़, पुट्ठा, कमर, नितंब
Al-Quran Fi Kull-e-Lisan
अननोन ऑथर
Khatir-e-Ahbab
शायरी
काले लोगाें की रौशन नज़्में
अमजद इस्लाम अमजद
Ustaz-ul-Kul Hazrat Maulana Mamlookul Ali Nanotavi
नूरुल हसन राशिद कान्धलवी नूरुल हसन राशिद का़धलवी
इतिहास
Kale Kose
बलवंत सिंह
नॉवेल / उपन्यास
Be-Shumar Kele
रोहिणी नीलेकणी नोनी
कहानी
Kele Ka Chhilka Aur Dusare Mazmeen
सिंद-बाद जहाज़ी
Dastoor Kul-Hind Majlis Ittehadul Muslimeen
संविधान / आईन
Uljhi Ladki Kaale Baal
कृष्ण चंदर
कहानी संग्रह
Kale Nahang
रज़ी हैदर गिलानी
नज़्म
Ku-e-Butan
कैफ़ भोपाली
काव्य संग्रह
Kale Jismon Ki Riyazat
ख़ालिद सुहैल
अनुवाद
Khule Dariche Band Hawa
मुज़फ़्फ़र वारसी
Hawai Qile
लेख
Kufr Ke Andheron Se Noor-e-Islam Tak
ग़ाज़ी अहमद
आत्मकथा
मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहींजो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले
कू-ए-जानाँ में सोग बरपा हैकि अचानक सुधर गया हूँ मैं
न उठे आह का धुआँ भी कि वोकू-ए-दिल में ख़िराम कर रहे हैं
फूल शाख़ों पे खिलने लगे तुम कहोजाम रिंदों को मिलने लगे तुम कहोचाक सीनों के सिलने लगे तुम कहोइस खुले झूट को ज़ेहन की लूट कोमैं नहीं मानता मैं नहीं जानता
दिल फिर तवाफ़-ए-कू-ए-मलामत को जाए हैपिंदार का सनम-कदा वीराँ किए हुए
कितना है बद-नसीब 'ज़फ़र' दफ़्न के लिएदो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
मैं खुले दर के किसी घर का हूँ सामाँ प्यारेतू दबे-पाँव कभी आ के चुरा ले मुझ को
हुई है हज़रत-ए-नासेह से गुफ़्तुगू जिस शबवो शब ज़रूर सर-ए-कू-ए-यार गुज़री है
आमद-ए-दोस्त की नवेद कू-ए-वफ़ा में आम थीमैं ने भी इक चराग़ सा दिल सर-ए-शाम रख दिया
नहीं अब तो अहल-ए-जुनूँ में भी वो जो शौक़-ए-शहर में 'आम थावो जो रंग था कभी कू-ब-कू सर-ए-कू-ए-यार भी अब नहीं
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