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शेर
रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं
क़यामत है मुसाफ़िर रास्ता दिन को भटकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नज़्म
एक दौर
चाँद क्यूँ अब्र की उस मैली सी गठरी में छुपा था
उस के छुपते ही उतर आए थे शाख़ों से लटकते हुए
गुलज़ार
नज़्म
नया साल
दर्द के पैरहन-ए-चाक से झाँको तो ज़रा
मुर्दा सूरज पे लटकते हुए मैले बादल
अहमद नदीम क़ासमी
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ग़ज़ल
रुख़-ए-रौशन पे उस की गेसू-ए-शब-गूँ लटकते हैं
क़यामत है मुसाफ़िर रास्ता दिन को भटकते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
नज़्म
अचार का मर्तबान
तुम्हारी अम्मी ने अपनी इज़्ज़त को मर्तबानों में बंद कर के
मकाँ की छत से लटकते छींके में रख दिया था
फ़य्याज़ तहसीन
शेर
लटकते देखा सीने पर जो तेरे तार-ए-गेसू को
उसे दीवाने वहशत में तिरा बंद-ए-क़बा समझे
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
नज़्म
मन अरफ़ा नफ़्सहू
उजले कपड़ों की क़तारों से लटकते हुए इंजीर के ख़ोशे
राख के ढेर
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
लटकते देखा सीने पर जो तेरे तार-ए-गेसू को
उसे दीवाने वहशत में तिरा बंद-ए-क़बा समझे
सरदार गंडा सिंह मशरिक़ी
शेर
काकुल नहीं लटकते कुछ उन की छातियों पर
चौकाँ से ये खिलंडरे गेंदें उछालते हैं