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ग़ज़ल
कितने कानों के वो कच्चे हैं कि अल्लाह की पनाह
क्या रक़ीबों की बन आई है इलाही तौबा
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
हज़ार शर्म करो वस्ल में हज़ार लिहाज़
न निभने देगा दिल-ए-ज़ार ओ बे-क़रार लिहाज़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
ये बे-रुख़ी ये तर्क-ए-तअ'ल्लुक़ के सिलसिले
कुछ तो लिहाज़-ए-रिश्ता-ए-अह्द-ए-वफ़ा रहे
ज़हीरुद्दीन क़ुरैशी
ग़ज़ल
ज़रा सा इक लिहाज़-ए-आबरू-ए-इश्क़ है वर्ना
मुझे अब ख़ौफ़-ए-दुनिया है न कोई ख़ौफ़-ए-रुस्वाई
सज्जाद सय्यद
नज़्म
ताज-महल
ख़याल-ए-हुस्न-ओ-मोहब्बत लिहाज़-ए-अह्द-ए-वफ़ा
दिल-ओ-नज़र को जगाए कि जैसे सेहर किया
दौर आफ़रीदी
ग़ज़ल
लिहाज़-ए-दामन-ए-क़ातिल मिरे लहू ने किया
ख़याल-ए-शर्त-ए-अदब ख़ुद रग-ए-गुलू ने किया
बेताब अज़ीमाबादी
ग़ज़ल
लिहाज़-ए-ताब-ए-दिल ऐ बे-महाबा देखने वाले
पशेमाँ भी हुए हैं उन का जल्वा देखने वाले
रशीद शाहजहाँपुरी
ग़ज़ल
न था कुछ दूर गुलशन भी क़फ़स ही ले के उड़ जाते
मगर पास-ओ-लिहाज़-ए-ख़ातिर-ए-सय्याद करते हैं
शहीर मछलीशहरी
ग़ज़ल
अद्ल का मिस्ल-ए-दर-तौबा है दरवाज़ा खुला
कुछ ज़रूरत ही नहीं इज़हार की तकरार की