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ग़ज़ल
कहीं यही तो नहीं काशिफ़-ए-हयात-ओ-ममात
ये हुस्न ओ इश्क़ ब-ज़ाहिर हैं बे-ख़बर फिर भी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
मस्जिद-ए-क़ुर्तुबा
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब नक़्श-गर-ए-हादसात
सिलसिला-ए-रोज़-ओ-शब अस्ल-ए-हयात-ओ-ममात
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हिण्डोला
ज़माना-ए-गुज़राँ में दवाम का सरगम
ये बज़्म-ए-जश्न-ए-हयात-ओ-ममात सजती हुई
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
शाम-ए-अयादत
क़रीब-तर मैं हो चला हूँ दुख की काएनात से
मैं अजनबी नहीं रहा हयात से ममात से
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
ग़ुरूर ले के मरा इख़्तियार-ए-हस्ती का
तू अपनी फ़िक्र-ए-हयात-ओ-ममात ले के गया
अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी
नज़्म
मोहब्बत के इस बे-कराँ सफ़र में
तख़्लीक़ का मम्बा, शक्ति का ख़ज़ीना तेरी ज़ात
मेहवर-ए-ला-मुतनाही सिलसिला-ए-हयात-ओ-ममात
परवेज़ शहरयार
ग़ज़ल
बशीरुद्दीन अहमद देहलवी
ग़ज़ल
ख़ुदी अगर है तो हैं सुर्ख़-रू हयात-ओ-ममात
ख़ुदी नहीं तो हयात-ओ-ममात ख़ार-अो-ज़बूँ

