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नज़्म
हव्वा की बेटी
सच मेरे वजूद में मतली की तरह तैरता है
जब भी यूँ ही खिड़की से मौसम उतरते हैं
कोमल राजा
नज़्म
उस के दुश्मन
तवील मतली की जान-लेवा सी कैफ़ियत से नजात पाई
मगर फ़लक के फ़राख़ आँगन में
वज़ीर आग़ा
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
देख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ माली
कौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वाली
अल्लामा इक़बाल
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ग़ज़ल
उस को भी जला दुखते हुए मन इक शो'ला लाल भबूका बन
यूँ आँसू बन बह जाना क्या यूँ माटी में मिल जाना क्या
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
जिस चीज़ से तुझ को निस्बत है जिस चीज़ की तुझ को चाहत है
वो सोना है वो हीरा है वो माटी हो या कंकर हो
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
कैफ़ी आज़मी
नज़्म
उस आँगन का चाँद
अपने सीने के मतला' पर जो चमका वो चाँद हुआ
जिस ने मन के अँधियारे में आन किया उजियारा चाँद
इब्न-ए-इंशा
नज़्म
मुफ़्लिसी
माँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती है
बेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
किसान
जिस की ताबिश में दरख़शानी हिलाल-ए-ईद की
ख़ाक के मायूस मतला पर किरन उम्मीद की






