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ग़ज़ल
नज़रें मिलावे गर कोई तुझ से कभी तो जान-ए-मन
उस के तईं तू दूर से आँखें तनिक दिखा कि यूँ
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
फ़र्क़ हरगिज़ नहीं जो तुझ से मिलावे आँखें
तीर और ख़ंजर-ओ-जम्धर के ज़ख़म चारों एक
क़ासिम अली ख़ान अफ़रीदी
कुल्लियात
यूसुफ़ से कोई क्यूँकर उस माह को मिलावे
है फ़र्क़ रात दिन का अज़-दीदा ता-शुनीदा
मीर तक़ी मीर
कुल्लियात
क्या मिलावे आँख नर्गिस उस की चश्म-ए-सुर्ख़ से
ज़र्द उस ग़म-दीदा को आज़ार है यरक़ान का
मीर तक़ी मीर
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ग़ज़ल
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो
बशीर बद्र
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
किसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लो
मिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लो
अल्लामा इक़बाल
शेर
मिलाते हो उसी को ख़ाक में जो दिल से मिलता है
मिरी जाँ चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है

