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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
चाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोई
कहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोई
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलो
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहीं
तोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहीं
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
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नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
फ़िदा करता रहा दिल को हसीनों की अदाओं पर
मगर देखी न उस आईने में अपनी अदा तू ने
अल्लामा इक़बाल
शेर
वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है
मिरी यादों में इक भूला हुआ चेहरा भी रहता है
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
जाने किस ख़ाक में पोशीदा हैं आँसू मेरे
किन फ़ज़ाओं में मुअ'ल्लक़ हैं तुम्हारी बातें
अहमद मुश्ताक़
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
ज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मर
यूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मोहब्बत
अभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनिया
मज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम से
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
याद-ए-अलीगढ़
वो शमशाद बिल्डिंग पे इक शोर-ए-महशर
वो मुबहम सी बातें वो पोशीदा नश्तर
आबिदुल्लाह ग़ाज़ी
नज़्म
राखी
इतिहास में राखी है रिश्ता भाई बहनों का
हवाला इस में पोशीदा है सदियों के रिश्तों का
फौज़िया मुग़ल
ग़ज़ल
देखिए किस हुस्न से पोशीदा ग़म का राज़ है
तीर मेरे दिल में है पर्दे में तीर-अंदाज़ है
रशीद लखनवी
ग़ज़ल
वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है
मिरी यादों में इक भूला हुआ चेहरा भी रहता है
साक़ी फ़ारुक़ी
ग़ज़ल
बुलंदी चाहिए इंसान की फ़ितरत में पोशीदा
कोई हो भेस लेकिन शान-ए-सुल्तानी नहीं जाती



