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नज़्म
मालूम नहीं क्यूँ
अब ख़ून के धब्बे हैं मुदीरों की क़बा पर
ख़ामा दम-ए-समसाम है मालूम नहीं क्यूँ
शोरिश काश्मीरी
ग़ज़ल
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
पहले इस में सर था ऐ समसाम इश्क़ और जान थी
क्यूँकि मिलता तुझ से आ अब हाथ ख़ाली हो गया
दत्तात्रिया कैफ़ी
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ग़ज़ल
ख़ाना-ए-मक़्तल में होता है गुमाँ फ़िरदौस का
मोर बन कर जब दिखाती है तिरी समसाम रक़्स
मुंशी खैराती लाल शगुफ़्ता
ग़ज़ल
दाम-ए-हर-मौज में है हल्क़ा-ए-सद-काम-ए-नहंग
देखें क्या गुज़रे है क़तरे पे गुहर होते तक
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
किस का काबा कैसा क़िबला कौन हरम है क्या एहराम
कूचे के उस के बाशिंदों ने सब को यहीं से सलाम किया
मीर तक़ी मीर
ग़ज़ल
देखो ये मेरे ख़्वाब थे देखो ये मेरे ज़ख़्म हैं
मैं ने तो सब हिसाब-ए-जाँ बर-सर-ए-आम रख दिया











