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ग़ज़ल
'सोज़' हर लम्हा वही मस्लहत-ए-वक़्त की बात
सुन के दीवाने को 'आक़िल पे हँसी आती है
सोज़ नजीबाबादी
हास्य
कोह ओ दमन में गूँज गई हर तरफ़ फ़ुग़ाँ
पें-पें की सोज़-ओ-साज़ में सब से रवाँ रवाँ
फ़ुर्क़त काकोरवी
ग़ज़ल
सदार ख़ान सोज़
ग़ज़ल
जल्वे हैं उन के नौ-ब-नौ मेरी निगाह में
अब उन को ग़म ये है ग़म-ए-फ़ुर्क़त नहीं मुझे
सदार ख़ान सोज़
ग़ज़ल
उसी ख़ुदा से है उम्मीद-ए-मग़्फ़िरत ऐ 'सोज़'
कि जिस का ख़ौफ़ तिरे दिल में उम्र भर न रहा