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ग़ज़ल
क्या तमाशा देखिए तहसील-ए-ला-हासिल में है
एक दुनिया का मज़ा दुनिया-ए-आब-ओ-गिल में है
सरवर आलम राज़
ग़ज़ल
मोहब्बत भी है मर्ग-ए-ना-गहाँ का शौक़ भी दिल में
ज़रा देखो हमारी महवियत तहसील-ए-हासिल में
मानी जायसी
ग़ज़ल
ब-फ़ैज़-ए-बे-ख़ुदी ऐसे मक़ाम-ए-शौक़ में हम थे
जहाँ कार-ए-हुसूल-ए-मुद्दआ तहसील-ए-हासिल था
नातिक़ गुलावठी
ग़ज़ल
कर के हासिल दौलत-ओ-शोहरत भी ख़ल्वत सी रही
हर क़दम पड़ती रहीं पैहम मिरी तन्हाइयाँ
सुजीत सहगल हासिल
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ग़ज़ल
मआल-ए-जुस्तजू है इक नशात-ए-ज़ौक़-ए-नाकामी
न हँस ओ हासिल-ए-तहसील-ए-हासिल देखने वाले
सय्यद वाजिद अली फ़र्रुख़ बनारसी
ग़ज़ल
पत्थरों के रास्ते से अपने शीशे के क़दम
सई-ए-ला-हासिल का इक पैग़ाम ले कर आए हैं
सय्यदा शान-ए-मेराज
ग़ज़ल
दौलत-ए-दीदार हस्ब-ए-मुद्दआ हासिल हुई
मिल गई जिस शख़्स को तक़दीर से इक्सीर-ए-इश्क़
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
मर चुका मैं तो नहीं उस से मुझे कुछ हासिल
बरसे गर पानी की जा आब-ए-बक़ा मेरे ब'अद
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
शेर
मर चुका मैं तो नहीं इस से मुझे कुछ हासिल
बरसे गिर पानी की जा आब-ए-बक़ा मेरे बा'द
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
रुख़्साना निकहत लारी उम्म-ए-हानी
ग़ज़ल
रही जो तहसील-ए-आब-ओ-दाना की शर्त ख़ाना-ब-दोश होना
किसी परिंदे का आशियाना चमन के अंदर नहीं रहेगा
गुलज़ार बुख़ारी
नज़्म
मौत की जुस्तुजू
रूह को जेहद-ए-तहसील-ए-ज़र खा गई
ज़ेहन की रौशनी ना-उम्मीदी की ज़ुल्मत में धुँदला गई