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ग़ज़ल
वसाएल जब कि सारे हो चुके थे बे-असर 'अंजुम'
चराग़-ए-दिल जला कर दूर की है तीरगी हम ने
ग़यास अंजुम
ग़ज़ल
कभी अपने वसाएल से न बढ़ कर ख़्वाहिशें पा लूँ
वो पौदा टूट जाता है जो ला-महदूद फलता है
तनवीर सिप्रा
ग़ज़ल
दर्शन सिंह
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विषय
वस्ल
वस्ल शायरी
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रुबाई
इस्माइल मेरठी
नज़्म
भली सी एक शक्ल थी
सो एक रोज़ क्या हुआ
वफ़ा पे बहस छिड़ गई
मैं इश्क़ को अमर कहूँ
वो मेरी ज़िद से चिड़ गई







