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शेर
दिल तो बे-तरह मेरा लग ही चला था उस से
पर मैं जूँ तूँ के बचाया इसे ख़ुद्दारी से
फ़ख़रुद्दीन ख़ाँ माहिर
शेर
दोज़ख़ ओ जन्नत हैं अब मेरी नज़र के सामने
घर रक़ीबों ने बनाया उस के घर के सामने