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शेर
सहरा में 'हवस' ख़ार-ए-मुग़ीलाँ की मदद से
बारे मिरा ख़ूँ हर ख़स-ओ-ख़ाशाक को पहुँचा
मिर्ज़ा मोहम्मद तक़ी हवस
शेर
क्या अदा से आवे है दीवाना कर के सैर-ए-बाग़
फूल कानों में तो हैं ख़ार-ए-मुग़ीलाँ हाथ में
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
ख़ाक-ए-आशिक़ से जो उगता है मुग़ीलाँ का दरख़्त
उस की मिज़्गाँ का है मरक़द में भी खटका बाक़ी
आशिक़ अकबराबादी
शेर
इक जाम-ए-मय की ख़ातिर पलकों से ये मुसाफ़िर
जारोब-कश रहा है बरसों दर-ए-मुग़ाँ का
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
शेर
मोहतसिब भी पी के मय लोटे है मयख़ाने में आज
हाथ ला पीर-ए-मुग़ाँ ये लौटने की जाए है
अब्दुल रहमान एहसान देहलवी
शेर
'नज़र' ने उन को जब देखा तो डैडी साथ थे उन के
हमारे दरमियाँ हर वक़्त वो पीर-ए-मुग़ाँ क्यूँ हो?
नज़र बर्नी
शेर
क़द्र मुझ रिंद की तुझ को नहीं ऐ पीर-ए-मुग़ाँ
तौबा कर लूँ तो कभी मय-कदा आबाद न हो
रियाज़ ख़ैराबादी
शेर
मिरे दिल में है कि पूछूँ कभी मुर्शिद-ए-मुग़ाँ से
कि मिला जमाल-ए-साक़ी को ये तनतना कहाँ से
अब्दुल मजीद सालिक
शेर
पीर-ए-मुग़ाँ के पास वो दारू है जिस से 'ज़ौक़'
नामर्द मर्द मर्द-ए-जवाँ-मर्द हो गया