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शेर
मसल सच है बशर की क़दर नेमत ब'अद होती है
सुना है आज तक हम को बहुत वो याद करते हैं
भारतेंदु हरिश्चंद्र
शेर
फ़रिश्ता हर बशर को हर ज़मीं को आसमाँ समझे
कि हम तो इश्क़ में दुनिया को ही जन्नत-निशाँ समझे
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
शेर
किसी की ज़ुल्फ़ के सौदे में रात की है बसर
किसी के रुख़ के तसव्वुर में दिन तमाम किया
पीर शेर मोहम्मद आजिज़
शेर
हर शय में हर बशर में नज़र आ रहा है तू
सज्दे में अपने सर को झुकाऊँ कहाँ कहाँ
जितेन्द्र मोहन सिन्हा रहबर
शेर
न जाने किस तरह बिस्तर में घुस कर बैठ जाती हैं
वो आवाज़ें जिन्हें हम रोज़ बाहर छोड़ आते हैं
ग़ज़नफ़र
शेर
कौन है तुझ सा जो बाँटे मिरी दिन भर की थकन
मुज़्महिल रात है बिस्तर का बदन दुखता है