aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "hasab"
इसी मिट्टी से हसब और नसब था अपनाक्यूँ हुए शहर में आवारा बहुत मत पूछो
कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाबआज तुम याद बे-हिसाब आए
ग़ैरों से कहा तुम ने ग़ैरों से सुना तुम नेकुछ हम से कहा होता कुछ हम से सुना होता
किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देतेसवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते
सदा ऐश दौराँ दिखाता नहींगया वक़्त फिर हाथ आता नहीं
कुछ उसूलों का नशा था कुछ मुक़द्दस ख़्वाब थेहर ज़माने में शहादत के यही अस्बाब थे
क्या कहूँ उस से कि जो बात समझता ही नहींवो तो मिलने को मुलाक़ात समझता ही नहीं
यहाँ किसी को भी कुछ हस्ब-ए-आरज़ू न मिलाकिसी को हम न मिले और हम को तू न मिला
हम जिस के हो गए वो हमारा न हो सकायूँ भी हुआ हिसाब बराबर कभी कभी
दोस्ती किस से न थी किस से मुझे प्यार न थाजब बुरे वक़्त पे देखा तो कोई यार न था
ख़र्च चलेगा अब मिरा किस के हिसाब में भलासब के लिए बहुत हूँ मैं अपने लिए ज़रा नहीं
आता है दाग़-ए-हसरत-ए-दिल का शुमार यादमुझ से मिरे गुनह का हिसाब ऐ ख़ुदा न माँग
मिरे गुनाह ज़ियादा हैं या तिरी रहमतकरीम तू ही बता दे हिसाब कर के मुझे
आसाँ न समझियो तुम नख़वत से पाक होनाइक उम्र खो के हम ने सीखा है ख़ाक होना
गुनाह गिन के मैं क्यूँ अपने दिल को छोटा करूँसुना है तेरे करम का कोई हिसाब नहीं
इक इश्क़ का ग़म आफ़त और उस पे ये दिल आफ़तया ग़म न दिया होता या दिल न दिया होता
सुकून-ए-दिल के लिए इश्क़ तो बहाना थावगरना थक के कहीं तो ठहर ही जाना था
ख़्वाबों पर इख़्तियार न यादों पे ज़ोर हैकब ज़िंदगी गुज़ारी है अपने हिसाब में
उस अजनबी से हाथ मिलाने के वास्तेमहफ़िल में सब से हाथ मिलाना पड़ा मुझे
आश्ना बेवफ़ा नहीं होताबेवफ़ा आश्ना नहीं होता
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