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ग़ज़ल
तुम उस काफ़िर का ज़ौक़-ए-बंदगी अब पूछते क्या हो
जिसे ताक़-ए-हरम भी अबरू-ए-ख़मदार हो जाए
असग़र गोंडवी
ग़ज़ल
क्यूँ असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार-ए-क़ातिल हो गया
हाए क्या बैठे-बिठाए तुझ को ऐ दिल हो गया
अबुल कलाम आज़ाद
ग़ज़ल
काम नज़रों से लिया अबरू-ए-ख़मदार के ब'अद
तीर मारे मुझे उस शोख़ ने तलवार के ब'अद
पुरनम इलाहाबादी
ग़ज़ल
गेसू-ए-ख़मदार में अशआ'र-ए-तर की ठंडकें
आतिश-ए-रुख़्सार में क़ल्ब-ए-तपाँ का इल्तिहाब
फ़िराक़ गोरखपुरी
ग़ज़ल
शम-ए-रुख़सार लिए गेसू-ए-ख़मदार लिए
सब अँधेरों में उजालों में मिरे पास रहो
अकबर अली खान अर्शी जादह
ग़ज़ल
है मोहब्बत सब को उस के अबरू-ए-ख़मदार की
हिन्द में क्या आबरू बाक़ी रही तलवार की
इमाम बख़्श नासिख़
ग़ज़ल
मैं अपना इस्तिग़ासा ले के जाऊँ किस 'अदालत में
अगर दिल ही असीर-ए-गेसू-ए-ख़म-दार हो जाए
सुहैब फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
क्या ही अफ़्शाँ है जबीन ओ अबरू-ए-ख़मदार पर
है चराग़ाँ आज का'बे के दर ओ दीवार पर
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
ग़ज़ल
मैं तो हर हर ख़म-ए-गेसू की तलाशी लूँगा
कि मिरा दिल है तिरे गेसू-ए-ख़मदार के पास