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ग़ज़ल
जुज़ ज़ुल्फ़ सूझता नहीं ऐ मुर्ग़-ए-दिल तुझे
ख़ुफ़्फ़ाश तू नहीं है कि ज़ुल्मत-परस्त है
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
ग़ज़ल
मुर्ग़-ए-ज़र्रीन-ए-फ़लक पर है यक़ीन-ए-ख़ुफ़्फ़ाश
किस क़दर मेरे दिनों में हुईं सारी रातें