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ग़ज़ल
ये लड़की कमज़ोर सी लड़की मरियम भी है ज़ोहरा भी
राबिया-बसरी बनी तो फिर वलियों से बढ़ गई बेटी
समीना असलम समीना
ग़ज़ल
ख़ुशी तक़्सीम करती हूँ दिल-आज़ारी नहीं आती
मिरा मक़्सद है ग़म-ख़्वारी अदाकारी नहीं आती
राबिआ बसरी
ग़ज़ल
आग़ाज़ अपना वहशत बसरी अंजाम अपना शोरीदा-सरी
हम आज भी हैं बदनाम बहुत हम कल भी निहायत रुस्वा थे