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ग़ज़ल
उन की मस्त आँखों ने कर डाला है मस्ताना मुझे
अब नहीं है एहतियाज-ए-दौर-ए-पैमाना मुझे
जौहर ज़ाहिरी
ग़ज़ल
क्या काम इंक़लाब का कुछ भी नहीं यहाँ
दौर-ए-फ़लक के दौरा-ए-साग़र को इत्तिलाअ
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या वज्ह तेरे ज़ुल्म-ओ-सितम में मज़ा नहीं
ऐ दौर-ए-चर्ख़ आज वो शायद नहीं शरीक
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
क्या जाने कब वो सुब्ह-ए-बहाराँ हो जल्वा-गर
दौर-ए-ख़िज़ाँ में जिस से बहलते रहे हैं हम
आल-ए-अहमद सुरूर
ग़ज़ल
चली जाएगी इक ही रुख़ हवा ताकि ज़माने की
न पूरा होगा तेरा दौर ये ऐ आसमाँ कब तक
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
सब उसी की सी कह रहे हैं 'अज़ीज़'
किस से हम अर्ज़-ए-एहतियाज करें