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ग़ज़ल
मिटता है फ़ौत-ए-फ़ुर्सत-ए-हस्ती का ग़म कोई
उम्र-ए-अज़ीज़ सर्फ़-ए-इबादत ही क्यूँ न हो
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
उम्र के फ़ौत का हम मर्सिया पढ़ते जो कभू
आन कर ख़िज़्र ओ मसीह अपने जवाबी होते
मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी
ग़ज़ल
डालते हैं अहल-ए-दुनिया ख़ेमे अब सहरा के बीच
फ़ौत-ए-मजनूँ से है बे-वारिस बयाबाँ अल-अयाज़
वली उज़लत
ग़ज़ल
मुझ से पहले भी कुछ वहशी इस उलझन में फ़ौत हुए
आख़िर किस का दस्त-ए-जुनूँ है वहशत की आसानी में
ओसामा ख़ालिद
ग़ज़ल
ये वक़्त आने पे अपनी औलाद अपने अज्दाद बेच देगी
जो फ़ौज दुश्मन को अपना सालार गिरवी रख कर पलट रही है
तहज़ीब हाफ़ी
ग़ज़ल
इब्न-ए-इंशा
ग़ज़ल
बिन चाहे बिन बोले पल में टूट फूट कर फिर बन जाए
बालक सोच रहा है अब भी ऐसा कोई खिलौना होगा