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ग़ज़ल
आहटें सुन कर ही मर जाती है सहराओं की ख़ाक
अब तिरे वहशी से डर जाती है सहराओं की ख़ाक
मिस्दाक़ आज़मी
ग़ज़ल
फ़ना कहते हैं किस को मौत से पहले ही मर जाना
बक़ा है नाम किस का अपनी हस्ती से गुज़र जाना