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ग़ज़ल
इतना जूया-ए-मुलाक़ात न होता था 'लुत्फ'
शक्ल निभने की जो कुछ थी सो मुसावात में थी
मिर्ज़ा अली लुत्फ़
ग़ज़ल
ब-सैल-ए-अश्क लख़्त-ए-दिल है दामन-गीर मिज़्गाँ का
ग़रीक़-ए-बहर जूया-ए-ख़स-ओ-ख़ाशाक-ए-साहिल है
मिर्ज़ा ग़ालिब
ग़ज़ल
बाग़ बाज़ार-ए-तमाशा आँख जूया-ए-बहार
चश्म-ए-नर्गिस या तन-ए-सर्व-ए-सही क्या देखना