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ग़ज़ल
मिर्ज़ा आसमान जाह अंजुम
ग़ज़ल
दिल के दाग़ों ने किया हम को चमन से बे-नियाज़
मन्नतें मानी हैं बरसों तब ये बाग़ आया है हाथ
आशिक़ अकबराबादी
ग़ज़ल
चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है
हसरत मोहानी
ग़ज़ल
कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे