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ग़ज़ल
इक सफ़र हौसले और ख़्वाहिश की तस्दीक़ करता हुआ
एक रस्ते पे मा'दूम होते हुए नक़्श-ए-पा के लिए
अज़्म बहज़ाद
ग़ज़ल
जो ये कहता था कि मैं हूँ इक निशान-ए-ला-ज़वाल
नक़्श-ए-फ़ानी की तरह मा'दूम कैसे हो गया
क़ासिम जलाल
ग़ज़ल
मा'दूम अगर हो तो कहाँ ढूँढने जाएँ
मौजूद अगर हो तो पता क्यूँ नहीं देते