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ग़ज़ल
तग़य्युरात-ए-ज़माना से सब हुए मुतअस्सिर
हमारी राह वही है कि पेश-ओ-पस में नहीं हम
ख़ुर्शीद अम्बर प्रतापगढ़ी
ग़ज़ल
मुझे छोड़ दे मिरे हाल पर तिरा क्या भरोसा है चारा-गर
ये तिरी नवाज़िश-ए-मुख़्तसर मिरा दर्द और बढ़ा न दे
शकील बदायूनी
ग़ज़ल
सबा अकबराबादी
ग़ज़ल
नगरी नगरी फिरा मुसाफ़िर घर का रस्ता भूल गया
क्या है तेरा क्या है मेरा अपना पराया भूल गया
मीराजी
ग़ज़ल
मुंतज़िर हैं दम-ए-रुख़्सत कि ये मर जाए तो जाएँ
फिर ये एहसान कि हम छोड़ के जाते भी नहीं