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ग़ज़ल
है सौ अदाओं से उर्यां फ़रेब-ए-रंग-ए-अना
बरहना होती है लेकिन हिजाब-ए-ख़्वाब के साथ
बद्र-ए-आलम ख़लिश
ग़ज़ल
आले रज़ा रज़ा
ग़ज़ल
तमाँचा बाग़ के रुख़्सार पर लगा किस का
कि ताएरों का भी रंग-ए-सुख़न शिकस्ता है
औलाद-ए-रसूल क़ुद्सी
ग़ज़ल
हाथ से उन के टपकते नहीं मय के क़तरे
अश्क-ए-ख़ूँ रोता है ये रंग-ए-हिना मेरे ब'अद
परवीन उम्म-ए-मुश्ताक़
ग़ज़ल
काश बे-रब्त ख़यालों को भी दे पाऊँ ज़बाँ
रिश्ता-ए-लफ़्ज़ कहीं टूट गया है मुझ से