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ग़ज़ल
कोई ग़ज़ल में ग़ज़ल है ये हज़रत-ए-'वहशत'
ख़याल था कि ग़ज़ल आप ने कही होगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
मगर दिल हो गया मेरा सिपुर्द-ए-रक़्स-ए-वहशत
किसी के इश्क़ में दिल को कुशादा तो किया था
राकेश दिलबर
ग़ज़ल
किस तरह हुस्न-ए-ज़बाँ की हो तरक़्क़ी 'वहशत'
मैं अगर ख़िदमत-ए-उर्दू-ए-मुअ'ल्ला न करूँ
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
जफ़ा-ए-दुश्मनाँ और बेवफ़ाई-हा-ए-याराँ से
बहुत ग़म-दीदा हो कर 'वहशत'-ए-आज़ुर्दा-जाँ रोया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
बला की होती है 'वहशत' की भी ग़ज़ल-ख़्वानी
कि इक सुरूर सा होता है अहल-ए-महफ़िल को
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
'वहशत' को रहा उन्स जो यूँ फ़न्न-ए-सुख़न से
ये शाख़-ए-हुनर फूलती-फलती ही रहेगी
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
अब तसव्वुर में कहाँ शक्ल-ए-तमन्ना 'वहशत'
जिस को मुद्दत से न देखा हो वो क्या याद रहे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ग़ज़ल
हवा है शौक़-ए-सुख़न दिल में मौज-ज़न 'वहशत'
कि हम-सफ़ीर मिरा रो'ब सा सुख़न-दाँ है