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ग़ज़ल
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
हसीनान-ए-चमन पर ख़ात्मा है जामा-ज़ेबी का
फटा पड़ता है जोबन जो ये पैराहन बनाते हैं
आग़ा हज्जू शरफ़
ग़ज़ल
देख उस की जामा-ज़ेबी गुल ने अपना पैरहन
इस क़दर फाड़ा कि बुलबुल से नहीं जाता पिया
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
तुम्हारी शाइ'री से दिल ही जलता है फ़क़त 'ज़ेबी'
कि मुमकिन ही नहीं इस्लाह यूँ जाँ को खपाने से
ज़ेबुन्निसा ज़ेबी
ग़ज़ल
आख़िरी अब ख़त्म होने को है बाब-ए-ज़िंदगी
लो मुकम्मल हो गई 'ज़ेबी' किताब-ए-ज़िंदगी
ज़ेबुन्निसा ज़ेबी
ग़ज़ल
अभी भी वक़्त है 'ज़ेबी' अगर चाहो तो लौट आओ
यहाँ भी नाम लिक्खा है तुम्हारा दाने दाने पर
ज़ेबुन्निसा ज़ेबी
ग़ज़ल
वो देख सामने रौशन चराग़-ए-मंज़िल है
है 'ज़ेबी' अज़्म सफ़र का तो फिर न फ़ासला देख