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ग़ज़ल
काएनात-ए-हुस्न में इक बरहमी पाती हूँ मैं
ज़िंदगी में ज़िंदगी ही की कमी पाती हूँ मैं
ज़ुबैदा तहसीन
ग़ज़ल
साहिल से तबीअत घबराई मौजों में सफ़ीना छोड़ दिया
जीने की लगन में हम ही ने जीने का क़रीना छोड़ दिया
ज़ुबैदा तहसीन
ग़ज़ल
गुलज़ार खिला डाला जिस राह से हम गुज़रे
चुनते हुए ख़ारों को ज़ख़्मों की क़सम गुज़रे