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ग़ज़ल
दिल की आग कहाँ ले जाते जलती बुझती छोड़ चले
बंजारों से डरने वालो लो हम अपनी बस्ती छोड़ चले
क़ैसर-उल जाफ़री
ग़ज़ल
वो मैं नहीं कि छुपाए फिरूँ कनार में दिल
जो लेने वाला मिले फेंक दूँ हज़ार में दिल
मुंशी बनवारी लाल शोला
ग़ज़ल
बन के किस शान से बैठा सर-ए-मिंबर वाइ'ज़
नख़वत-ओ-उज्ब हयूला है तो पैकर वाइ'ज़