aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम ",US6m"
दिल से जो बात निकलती है असर रखती हैपर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती हैक़ुदसी-उल-अस्ल है रिफ़अत पे नज़र रखती हैख़ाक से उठती है गर्दूं पे गुज़र रखती हैइश्क़ था फ़ित्नागर ओ सरकश ओ चालाक मिराआसमाँ चीर गया नाला-ए-बेबाक मिरापीर-ए-गर्दूं ने कहा सुन के कहीं है कोईबोले सय्यारे सर-ए-अर्श-ए-बरीं है कोईचाँद कहता था नहीं अहल-ए-ज़मीं है कोईकहकशाँ कहती थी पोशीदा यहीं है कोईकुछ जो समझा मिरे शिकवे को तो रिज़वाँ समझामुझ को जन्नत से निकाला हुआ इंसाँ समझाथी फ़रिश्तों को भी हैरत कि ये आवाज़ है क्याअर्श वालों पे भी खुलता नहीं ये राज़ है क्याता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्याआ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्याग़ाफ़िल आदाब से सुक्कान-ए-ज़मीं कैसे हैंशोख़ ओ गुस्ताख़ ये पस्ती के मकीं कैसे हैंइस क़दर शोख़ कि अल्लाह से भी बरहम हैथा जो मस्जूद-ए-मलाइक ये वही आदम हैआलिम-ए-कैफ़ है दाना-ए-रुमूज़-ए-कम हैहाँ मगर इज्ज़ के असरार से ना-महरम हैनाज़ है ताक़त-ए-गुफ़्तार पे इंसानों कोबात करने का सलीक़ा नहीं नादानों कोआई आवाज़ ग़म-अंगेज़ है अफ़्साना तिराअश्क-ए-बेताब से लबरेज़ है पैमाना तिराआसमाँ-गीर हुआ नारा-ए-मस्ताना तिराकिस क़दर शोख़-ज़बाँ है दिल-ए-दीवाना तिराशुक्र शिकवे को किया हुस्न-ए-अदा से तू नेहम-सुख़न कर दिया बंदों को ख़ुदा से तू नेहम तो माइल-ब-करम हैं कोई साइल ही नहींराह दिखलाएँ किसे रह-रव-ए-मंज़िल ही नहींतर्बियत आम तो है जौहर-ए-क़ाबिल ही नहींजिस से तामीर हो आदम की ये वो गिल ही नहींकोई क़ाबिल हो तो हम शान-ए-कई देते हैंढूँडने वालों को दुनिया भी नई देते हैंहाथ बे-ज़ोर हैं इल्हाद से दिल ख़ूगर हैंउम्मती बाइस-ए-रुस्वाई-ए-पैग़म्बर हैंबुत-शिकन उठ गए बाक़ी जो रहे बुत-गर हैंथा ब्राहीम पिदर और पिसर आज़र हैंबादा-आशाम नए बादा नया ख़ुम भी नएहरम-ए-काबा नया बुत भी नए तुम भी नएवो भी दिन थे कि यही माया-ए-रानाई थानाज़िश-ए-मौसम-ए-गुल लाला-ए-सहराई थाजो मुसलमान था अल्लाह का सौदाई थाकभी महबूब तुम्हारा यही हरजाई थाकिसी यकजाई से अब अहद-ए-ग़ुलामी कर लोमिल्लत-ए-अहमद-ए-मुर्सिल को मक़ामी कर लोकिस क़दर तुम पे गिराँ सुब्ह की बेदारी हैहम से कब प्यार है हाँ नींद तुम्हें प्यारी हैतब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी हैतुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी हैक़ौम मज़हब से है मज़हब जो नहीं तुम भी नहींजज़्ब-ए-बाहम जो नहीं महफ़िल-ए-अंजुम भी नहींजिन को आता नहीं दुनिया में कोई फ़न तुम होनहीं जिस क़ौम को परवा-ए-नशेमन तुम होबिजलियाँ जिस में हों आसूदा वो ख़िर्मन तुम होबेच खाते हैं जो अस्लाफ़ के मदफ़न तुम होहो निको नाम जो क़ब्रों की तिजारत कर केक्या न बेचोगे जो मिल जाएँ सनम पत्थर केसफ़्हा-ए-दहर से बातिल को मिटाया किस नेनौ-ए-इंसाँ को ग़ुलामी से छुड़ाया किस नेमेरे काबे को जबीनों से बसाया किस नेमेरे क़ुरआन को सीनों से लगाया किस नेथे तो आबा वो तुम्हारे ही मगर तुम क्या होहाथ पर हाथ धरे मुंतज़िर-ए-फ़र्दा होक्या कहा बहर-ए-मुसलमाँ है फ़क़त वादा-ए-हूरशिकवा बेजा भी करे कोई तो लाज़िम है शुऊरअदल है फ़ातिर-ए-हस्ती का अज़ल से दस्तूरमुस्लिम आईं हुआ काफ़िर तो मिले हूर ओ क़ुसूरतुम में हूरों का कोई चाहने वाला ही नहींजल्वा-ए-तूर तो मौजूद है मूसा ही नहींमंफ़अत एक है इस क़ौम का नुक़सान भी एकएक ही सब का नबी दीन भी ईमान भी एकहरम-ए-पाक भी अल्लाह भी क़ुरआन भी एककुछ बड़ी बात थी होते जो मुसलमान भी एकफ़िरक़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैंक्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैंकौन है तारिक-ए-आईन-ए-रसूल-ए-मुख़्तारमस्लहत वक़्त की है किस के अमल का मेआरकिस की आँखों में समाया है शिआर-ए-अग़्यारहो गई किस की निगह तर्ज़-ए-सलफ़ से बे-ज़ारक़ल्ब में सोज़ नहीं रूह में एहसास नहींकुछ भी पैग़ाम-ए-मोहम्मद का तुम्हें पास नहींजा के होते हैं मसाजिद में सफ़-आरा तो ग़रीबज़हमत-ए-रोज़ा जो करते हैं गवारा तो ग़रीबनाम लेता है अगर कोई हमारा तो ग़रीबपर्दा रखता है अगर कोई तुम्हारा तो ग़रीबउमरा नश्शा-ए-दौलत में हैं ग़ाफ़िल हम सेज़िंदा है मिल्लत-ए-बैज़ा ग़ुरबा के दम सेवाइज़-ए-क़ौम की वो पुख़्ता-ख़याली न रहीबर्क़-ए-तबई न रही शोला-मक़ाली न रहीरह गई रस्म-ए-अज़ाँ रूह-ए-बिलाली न रहीफ़ल्सफ़ा रह गया तल्क़ीन-ए-ग़ज़ाली न रहीमस्जिदें मर्सियाँ-ख़्वाँ हैं कि नमाज़ी न रहेयानी वो साहिब-ए-औसाफ़-ए-हिजाज़ी न रहेशोर है हो गए दुनिया से मुसलमाँ नाबूदहम ये कहते हैं कि थे भी कहीं मुस्लिम मौजूदवज़्अ में तुम हो नसारा तो तमद्दुन में हुनूदये मुसलमाँ हैं जिन्हें देख के शरमाएँ यहूदयूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी होतुम सभी कुछ हो बताओ तो मुसलमान भी होदम-ए-तक़रीर थी मुस्लिम की सदाक़त बेबाकअदल उस का था क़वी लौस-ए-मराआत से पाकशजर-ए-फ़ितरत-ए-मुस्लिम था हया से नमनाकथा शुजाअत में वो इक हस्ती-ए-फ़ोक़-उल-इदराकख़ुद-गुदाज़ी नम-ए-कैफ़ियत-ए-सहबा-यश बूदख़ाली-अज़-ख़ेश शुदन सूरत-ए-मीना-यश बूदहर मुसलमाँ रग-ए-बातिल के लिए नश्तर थाउस के आईना-ए-हस्ती में अमल जौहर थाजो भरोसा था उसे क़ुव्वत-ए-बाज़ू पर थाहै तुम्हें मौत का डर उस को ख़ुदा का डर थाबाप का इल्म न बेटे को अगर अज़बर होफिर पिसर क़ाबिल-ए-मीरास-ए-पिदर क्यूँकर होहर कोई मस्त-ए-मय-ए-ज़ौक़-ए-तन-आसानी हैतुम मुसलमाँ हो ये अंदाज़-ए-मुसलमानी हैहैदरी फ़क़्र है ने दौलत-ए-उस्मानी हैतुम को अस्लाफ़ से क्या निस्बत-ए-रूहानी हैवो ज़माने में मुअज़्ज़िज़ थे मुसलमाँ हो करऔर तुम ख़्वार हुए तारिक-ए-क़ुरआँ हो करतुम हो आपस में ग़ज़बनाक वो आपस में रहीमतुम ख़ता-कार ओ ख़ता-बीं वो ख़ता-पोश ओ करीमचाहते सब हैं कि हों औज-ए-सुरय्या पे मुक़ीमपहले वैसा कोई पैदा तो करे क़ल्ब-ए-सलीमतख़्त-ए-फ़ग़्फ़ूर भी उन का था सरीर-ए-कए भीयूँ ही बातें हैं कि तुम में वो हमियत है भीख़ुद-कुशी शेवा तुम्हारा वो ग़यूर ओ ख़ुद्दारतुम उख़ुव्वत से गुरेज़ाँ वो उख़ुव्वत पे निसारतुम हो गुफ़्तार सरापा वो सरापा किरदारतुम तरसते हो कली को वो गुलिस्ताँ ब-कनारअब तलक याद है क़ौमों को हिकायत उन कीनक़्श है सफ़्हा-ए-हस्ती पे सदाक़त उन कीमिस्ल-ए-अंजुम उफ़ुक़-ए-क़ौम पे रौशन भी हुएबुत-ए-हिन्दी की मोहब्बत में बिरहमन भी हुएशौक़-ए-परवाज़ में महजूर-ए-नशेमन भी हुएबे-अमल थे ही जवाँ दीन से बद-ज़न भी हुएइन को तहज़ीब ने हर बंद से आज़ाद कियाला के काबे से सनम-ख़ाने में आबाद कियाक़ैस ज़हमत-कश-ए-तन्हाई-ए-सहरा न रहेशहर की खाए हवा बादिया-पैमा न रहेवो तो दीवाना है बस्ती में रहे या न रहेये ज़रूरी है हिजाब-ए-रुख़-ए-लैला न रहेगिला-ए-ज़ौर न हो शिकवा-ए-बेदाद न होइश्क़ आज़ाद है क्यूँ हुस्न भी आज़ाद न होअहद-ए-नौ बर्क़ है आतिश-ज़न-ए-हर-ख़िर्मन हैऐमन इस से कोई सहरा न कोई गुलशन हैइस नई आग का अक़्वाम-ए-कुहन ईंधन हैमिल्लत-ए-ख़त्म-ए-रसूल शोला-ब-पैराहन हैआज भी हो जो ब्राहीम का ईमाँ पैदाआग कर सकती है अंदाज़-ए-गुलिस्ताँ पैदादेख कर रंग-ए-चमन हो न परेशाँ मालीकौकब-ए-ग़ुंचा से शाख़ें हैं चमकने वालीख़स ओ ख़ाशाक से होता है गुलिस्ताँ ख़ालीगुल-बर-अंदाज़ है ख़ून-ए-शोहदा की लालीरंग गर्दूं का ज़रा देख तो उन्नाबी हैये निकलते हुए सूरज की उफ़ुक़-ताबी हैउम्मतें गुलशन-ए-हस्ती में समर-चीदा भी हैंऔर महरूम-ए-समर भी हैं ख़िज़ाँ-दीदा भी हैंसैकड़ों नख़्ल हैं काहीदा भी बालीदा भी हैंसैकड़ों बत्न-ए-चमन में अभी पोशीदा भी हैंनख़्ल-ए-इस्लाम नमूना है बिरौ-मंदी काफल है ये सैकड़ों सदियों की चमन-बंदी कापाक है गर्द-ए-वतन से सर-ए-दामाँ तेरातू वो यूसुफ़ है कि हर मिस्र है कनआँ तेराक़ाफ़िला हो न सकेगा कभी वीराँ तेराग़ैर यक-बाँग-ए-दारा कुछ नहीं सामाँ तेरानख़्ल-ए-शमा अस्ती ओ दर शोला दो-रेशा-ए-तूआक़िबत-सोज़ बवद साया-ए-अँदेशा-ए-तूतू न मिट जाएगा ईरान के मिट जाने सेनश्शा-ए-मय को तअल्लुक़ नहीं पैमाने सेहै अयाँ यूरिश-ए-तातार के अफ़्साने सेपासबाँ मिल गए काबे को सनम-ख़ाने सेकश्ती-ए-हक़ का ज़माने में सहारा तू हैअस्र-ए-नौ-रात है धुँदला सा सितारा तू हैहै जो हंगामा बपा यूरिश-ए-बुलग़ारी काग़ाफ़िलों के लिए पैग़ाम है बेदारी कातू समझता है ये सामाँ है दिल-आज़ारी काइम्तिहाँ है तिरे ईसार का ख़ुद्दारी काक्यूँ हिरासाँ है सहिल-ए-फ़रस-ए-आदा सेनूर-ए-हक़ बुझ न सकेगा नफ़स-ए-आदा सेचश्म-ए-अक़्वाम से मख़्फ़ी है हक़ीक़त तेरीहै अभी महफ़िल-ए-हस्ती को ज़रूरत तेरीज़िंदा रखती है ज़माने को हरारत तेरीकौकब-ए-क़िस्मत-ए-इम्काँ है ख़िलाफ़त तेरीवक़्त-ए-फ़ुर्सत है कहाँ काम अभी बाक़ी हैनूर-ए-तौहीद का इत्माम अभी बाक़ी हैमिस्ल-ए-बू क़ैद है ग़ुंचे में परेशाँ हो जारख़्त-बर-दोश हवा-ए-चमनिस्ताँ हो जाहै तुनक-माया तू ज़र्रे से बयाबाँ हो जानग़्मा-ए-मौज है हंगामा-ए-तूफ़ाँ हो जाक़ुव्वत-ए-इश्क़ से हर पस्त को बाला कर देदहर में इस्म-ए-मोहम्मद से उजाला कर देहो न ये फूल तो बुलबुल का तरन्नुम भी न होचमन-ए-दह्र में कलियों का तबस्सुम भी न होये न साक़ी हो तो फिर मय भी न हो ख़ुम भी न होबज़्म-ए-तौहीद भी दुनिया में न हो तुम भी न होख़ेमा-ए-अफ़्लाक का इस्तादा इसी नाम से हैनब्ज़-ए-हस्ती तपिश-आमादा इसी नाम से हैदश्त में दामन-ए-कोहसार में मैदान में हैबहर में मौज की आग़ोश में तूफ़ान में हैचीन के शहर मराक़श के बयाबान में हैऔर पोशीदा मुसलमान के ईमान में हैचश्म-ए-अक़्वाम ये नज़्ज़ारा अबद तक देखेरिफ़अत-ए-शान-ए-रफ़ाना-लका-ज़िक्र देखेमर्दुम-ए-चश्म-ए-ज़मीं यानी वो काली दुनियावो तुम्हारे शोहदा पालने वाली दुनियागर्मी-ए-मेहर की परवरदा हिलाली दुनियाइश्क़ वाले जिसे कहते हैं बिलाली दुनियातपिश-अंदोज़ है इस नाम से पारे की तरहग़ोता-ज़न नूर में है आँख के तारे की तरहअक़्ल है तेरी सिपर इश्क़ है शमशीर तिरीमिरे दरवेश ख़िलाफ़त है जहाँगीर तिरीमा-सिवा-अल्लाह के लिए आग है तकबीर तिरीतू मुसलमाँ हो तो तक़दीर है तदबीर तिरीकी मोहम्मद से वफ़ा तू ने तो हम तेरे हैंये जहाँ चीज़ है क्या लौह-ओ-क़लम तेरे हैं
उरूस-ए-शब की ज़ुल्फ़ें थीं अभी ना-आश्ना ख़म सेसितारे आसमाँ के बे-ख़बर थे लज़्ज़त-ए-रम सेक़मर अपने लिबास-ए-नौ में बेगाना सा लगता थान था वाक़िफ़ अभी गर्दिश के आईन-ए-मुसल्लम सेअभी इम्काँ के ज़ुल्मत-ख़ाने से उभरी ही थी दुनियामज़ाक़-ए-ज़िंदगी पोशीदा था पहना-ए-आलम सेकमाल-ए-नज़्म-ए-हस्ती की अभी थी इब्तिदा गोयाहुवैदा थी नगीने की तमन्ना चश्म-ए-ख़ातम सेसुना है आलम-ए-बाला में कोई कीमिया-गर थासफ़ा थी जिस की ख़ाक-ए-पा में बढ़ कर साग़र-ए-जम सेलिखा था अर्श के पाए पे इक इक्सीर का नुस्ख़ाछुपाते थे फ़रिश्ते जिस को चश्म-ए-रूह-ए-आदम सेनिगाहें ताक में रहती थीं लेकिन कीमिया-गर कीवो इस नुस्ख़े को बढ़ कर जानता था इस्म-ए-आज़म सेबढ़ा तस्बीह-ख़्वानी के बहाने अर्श की जानिबतमन्ना-ए-दिली आख़िर बर आई सई-ए-पैहम सेफिराया फ़िक्र-ए-अज्ज़ा ने उसे मैदान-ए-इम्काँ मेंछुपेगी क्या कोई शय बारगाह-ए-हक़ के महरम सेचमक तारे से माँगी चाँद से दाग़-ए-जिगर माँगाउड़ाई तीरगी थोड़ी सी शब की ज़ुल्फ़-ए-बरहम सेतड़प बिजली से पाई हूर से पाकीज़गी पाईहरारत ली नफ़स-हा-ए-मसीह-ए-इब्न-ए-मरयम सेज़रा सी फिर रुबूबियत से शान-ए-बे-नियाज़ी लीमलक से आजिज़ी उफ़्तादगी तक़दीर शबनम सेफिर इन अज्ज़ा को घोला चश्मा-ए-हैवाँ के पानी मेंमुरक्कब ने मोहब्बत नाम पाया अर्श-ए-आज़म सेमुहव्विस ने ये पानी हस्ती-ए-नौ-ख़ेज़ पर छिड़कागिरह खोली हुनर ने उस के गोया कार-ए-आलम सेहुई जुम्बिश अयाँ ज़र्रों ने लुत्फ़-ए-ख़्वाब को छोड़ागले मिलने लगे उठ उठ के अपने अपने हमदम सेख़िराम-ए-नाज़ पाया आफ़्ताबों ने सितारों नेचटक ग़ुंचों ने पाई दाग़ पाए लाला-ज़ारों ने
बिंत-ए-हव्वा हूँ मैं 'औरत है मिरा इस्म-ए-शरीफ़है ये पहचान मिरी और यही है ता'रीफ़
उदासी के उफ़ुक़ पर जब तुम्हारी याद के जुगनू चमकते हैंतो मेरी रूह पर रक्खा हुआ ये हिज्र का पत्थरचमकती बर्फ़ की सूरत पिघलता है!अगरचे यूँ पिघलने से ये पत्थर, संग-रेज़ा तो नहीं बनता!मगर इक हौसला सा दिल को होता है,कि जैसे सर-ब-सर तारीक शब में भीअगर इक ज़र्द-रू, सहमा हुआ तारा निकल आएतो क़ातिल रात का बे-इस्म जादू टूट जाता हैमुसाफ़िर के सफ़र का रास्ता तो कम नहीं होतामगर तारे की चिलमन सेकोई भूला हुआ मंज़र अचानक जगमगाता है!सुलगते पाँव में इक आबला सा फूट जाता है
इसी वजूद-ए-ख़ला में इन्साँवजूद-ए-इन्सान शिर्के-ए-आ’ज़मये एक नुक्ता है ‘इस्म-ए-आ’ज़म’किस ‘इस्म-ए-आ’ज़म’ की जुस्तुजू मेंकिताब तस्नीफ़ हो रही हैकिताब तालीफ़ हो रही है
सात सुहागनें और मेरी पेशानी!संदल की तहरीरभला पत्थर के लिखे को क्या धोएगीबस इतना हैजज़्बे की पूरी नेकी सेसब ने अपने अपने ख़ुदा का इस्म मुझे दे डाला हैऔर ये सुनने में आया हैशाम ढले जंगल के सफ़र मेंइस्म बहुत काम आते हैं!
एक मुद्दत हुई सोचते सोचतेतुम से कहना है कुछ पर मैं कैसे कहूँआरज़ू है मुझे ऐसे अल्फ़ाज़ कीजो किसी ने किसी से कहे ही न होंसोचता हूँ कि मौज-ए-सबा के सुबुक पाँव में कोई पाज़ेब ही डाल दूँचाहता हूँ कि इन तितलियों के परों में धनक बाँध दूँसुरमई शाम के गेसुओं में बंधी बारिशें खोल दूँ ख़ुशबुएँ घोल दूँफूल के सुर्ख़ होंटों पे अफ़्शाँ रखूँख़्वाब की माँग में नूर सिंदूर की कहकशाँ खींच दूँइक तख़य्युल की बे-रब्तियों को तसलसुल की ज़ंजीर दूँख़्वाब को जिस्म दूँ जिस्म को इस्म दूँकोई ता'बीर दूँ एक तस्वीर दूँ और तस्वीर को रू-ब-रू रख के इक हर्फ़-ए-तौक़ीर दूँक्या कहूँ ये कहूँ यूँ कहूँ पर मैं कैसे कहूँजितने अल्फ़ाज़ हैं सब कहे जा चुके सब सुने जा चुकेतिश्ना इज़हार को मो'तबर सा कोई अब सहारा मिलेइक किनाया मिले इक इशारा मिलेख़ूबसूरत अनोखी अलामत मिले अन-कहा अन-सुना इस्तिआरा मिलेआरज़ू है मुझे ऐसे अल्फ़ाज़ की जुस्तुजू है मुझे ऐसे अल्फ़ाज़ कीजिन से पत्थर को पानी किया जा सकेख़्वाब को इक हक़ीक़त किया जा सकेएक ज़िंदा कहानी किया जा सकेसरहद-ए-जावेदानी किया जा सके
ग़ुबार-ए-सुब्ह-ओ-शाम मेंतुझे तो क्यामैं अपना अक्स देख लूँ मैं अपना इस्म सोच लूँनहीं मिरी मजाल भीकि लड़खड़ा के रह गया मिरा हर इक सवाल भीमिरा हर इक ख़याल भीमैं भी बे-क़रार ओ ख़स्ता-तनबस इक शरार-ए-इश्क़ मेरा पैरहनमिरा नसीब एक हर्फ़-ए-आरज़ूवो एक हर्फ़-ए-आरज़ूतमाम उम्र सौ तरह लिखूँमिरा वजूद इक निगाह-ए-बे-सुकूँनिगाह जिस के पाँव में हैं बेड़ियाँ पड़ी हुई
इक कली गुलाब कीकूचा-ए-चमन में हैयाद एक ख़्वाब कीशाम के गगन में हैइस्म सब्ज़ बाब कापुर-फ़रेब बन में हैनक़्श इक शबाब कासाया-ए-कुहन में हैइक पुकारती सदाजब्र के गहन में हैदूर दूर तक हवाकोह और दमन में है
ये आदमी लड़ाई को वियतनाम में गयावो कोरिया गया कभी आसाम में गयावो तिलअबीब ओ क़ाहिरा ओ शाम में गयाये आदमी ही मुत्तहिद-अक़्वाम में गयाफिर आदमी को अम्न सिखाता है आदमीभैंसों के आगे बीन बजाता है आदमी
इस्म-ए-आज़मबहुत अच्छा हुआ था माँ ने मिरीसिखला दिए थे इस्म सारेमुझ को बचपन मेंतमाम आयात-ए-क़ुर्आनी, वज़ीफ़े और मुनाजातेंकि जिन के विर्द से सारी बलाएँ दूर रहती हैंहिसार उन का हर आफ़त और मुसीबत से बचाता हैउन्ही के हिफ़्ज़ से होती रही मुश्किल-कुशाई और मसीहाई
घड़ी की टिक-टिक बोल रही है रात के शायद एक बजे हैंबटला हाउस की एक गली में मोटे कुत्ते भौंक रहे हैंएक खंडर में तेज़ रौशनी चारों जानिब फैल रही हैबग़ल में लेटा साथी मेरा अब तक पब जी खेल रहा हैमैं भी अब तक जाग रहा हूँ आँखें मूँदे सोच रहा हूँनीचे जाना कैसा होगा बाहर कितनी सर्दी होगीक़ुतुब सितारा किधर को होगा रात की रानी कैसी होगीसुब्ह का सूरज कहाँ पे होगा अभी ख़ुदा क्या करता होगासड़क किनारे सोने वाले जोड़े कैसे सोते होंगेइन को मच्छर काटते होंगेनौम चोमसकी लॉन में बैठे बच्चे आख़िर कैसे होंगेउन को कुत्ते चाटते होंगेक्या इन भूक-ज़दा बच्चों के ख़्वाब में परियाँ आती होंगीकटे-फटे हाथों के तकिए के नीचे कुछ रखती होंगीकैसी बातें करते हो जी क्या परियों का काम यही हैमहल सराए छोड़ के अब वो सड़क किनारे आएँगी क्यारात के शायद डेढ़ बजे हैं बटला हाउस का चौक खुला हैरात को जॉब से आने वाले रात में जॉब को जाने वालेएक हाथ में लिए चाय कप एक हाथ में छोटी सिगरेटसड़क पार क्यों देख रहे हैंबिरयानी को ढूँढ रहे हैंउन के पीछे सड़क किनारे क़ब्रिस्तान का गेट खुला हैअंदर कुत्ते घूम रहे हैं शायद खाना ढूँढ रहे हैंबाहर सिगरेट और कॉफ़ी है अंदर काफ़ी तारीकी हैमैं भी अंदर झाँक रहा हूँ हौले हौले सोच रहा हूँक़ब्रिस्तान के अंदर में ये लैटरिन किस ने बनवायाक्यों बनवायाशायद मुर्दे रात में उठ कर उस के अंदर जाते होंगेहाजत पूरी करते होंगेया फिर सिगरेट पीने वाले लड़के अंदर जाते होंगेख़ाकी वर्दी घर वालों से छुप कर सिगरेट पीते होंगेएक किनारे अदब की मलिका सब कुछ बैठी देख रही हैआग का दरिया चाँदनी बेगम शीशे का घर लिखने वालीऐनी आपा सोच रही हैमेरा क़ारी क्यों आया हैशायद इस को गौतम शंकर तलअ'त ने उलझाया होगाया फिर उस को ख़याबाँ की चम्पा ने पगलाया होगाया फिर इस पागल लड़के ने शुऊ'र की रौ को छेड़ा होगाया फिर इस ने आग का दरिया आधा पढ़ कर छोड़ा होगाफ़लसफ़ियाना बातें सुन कर सारे मुर्दे सोचते होंगेकोई अपनी ख़्वाब-गाह को छोड़ के आख़िर क्यों आया हैमैं भी बैठा सोच रहा हूँइतनी रात को क्यों आया हूँ
इक्कीस साल उम्र थी उस की बसअभी उस ने गोया ज़िंदगी को आँख भर के देखा भी न थाखेलने कूदने के दिन थे कि ज़माने की रीत के मुताबिक़चट मंगनी पट ब्याह हो गयाऔर तीन साल में तीन बच्चे भी पैदा हो गएफिर अचानक बेचारी को वो बीमारी मिल गईजिस के पंजे से कोई ख़ुश-नसीब ही छुटता हैमुझे बरसों पहले गाँव में अपनी चितकबरी बकरी याद आ गईजिस ने एक झोली में पाँच बच्चे दिए थेऔर चंद रोज़ बा'द मर गई थीमरी हुई बकरी के थनों से इस के पाँचों बच्चेदूध की आख़िरी बूँद तक निचोड़ लेने के चक्कर मेंएक दूसरे से गुत्थम-गुत्था हो रहे थेमैं ने ख़ुदा से कहाग़ज़ब के सितम-ज़रीफ़ हो तुम भीआदमी को इतना कमज़ोर पैदा किया हैबकरी का बच्चा तो जन्म लेते ही चार टाँगों पर खड़ा हो जाता हैमगर आदमी का बच्चा बरस-हा-बरस तक यतीमों की तरह सहारे ढूँढता फिरता हैऔर फिर तुम ये सहारे भी छीन लेते होचलो मरहूम बाप की जगह तो तुम ख़ुद पुर कर लेते होकि आसमानी बाप कहलाने का तुम्हें अज़ल से शौक़ हैलेकिन ये नौ-मौलूद और नौ-ख़ेज़ बच्चों को तुम माओं से किस खाते में महरूम कर देते होहँसा बहुत हँसामैं कहे बग़ैर न रह सका कि आफ़रीन हैदूसरे के दुख पर इस तरह खिले बंदों तो सफ़्फ़ाक सियासत-दाँ भी नहीं हँसतेअचानक मेरा शाना झिंझोड़ कर बोला ज़रा मेरी तरफ़ देखोमुझे गुमान था कि तो रात और क़ुरआन के औराक़ से निकल करएक पुर-जलाल मर्दाना पैकर मेरे सामने होगामगर वहाँ तो एक हरी-भरी औरत खड़ी थीजिस की छातियों से दूध की धारें फ़व्वारे की तरह फूट रही थींक़रीब था कि मैं ग़श खा कर गिर जाताइसी ने मुझे सँभाला दियाऔर धीरे से कहामैं बाप भी हूँ आसमानों मेंमैं माँ भी हूँ ज़मीन परदोबारा उस की जानिब देखाआँखों से दो गर्म गर्म आँसू मेरे चेहरे पर टपक पड़ेमैं ने कहा पहले तुम हँस रहे थेअब तुम रो रही होकहा हँसी और रोने का एक ही नाम हैज़िंदगीमैं ने कहा तुम्हारे मर्दाना नामों का तो शुमार नहींलोगों को निन्नयानवे के फेरे में डाल रक्खा है तुम नेमुर्शिदों से इस्म-ए-आज़म पूछते पूछते बेहाल हो जाते हैंअब तुम्हारे ज़नाना नाम भी ढूँडने पड़ेंगेज़ेर-ए-लब मुस्कुरा के कहापैदा होते ही तुम सब के मुँह पर मेरा इस्म-ए-आज़म आ जाता हैहर कोई अज़-ख़ुद पुकार उठता हैमाँऔर फिर अपनी माँ की चाहत में सब की माँ की भूल जाता हैनाम भी याद नहीं रहता उस का
हर्फ़गोयाई की ज़ंजीर में जब क़ैद हुआइस्म बनाअहद बनानज़्म बनाक़िस्सा-ए-काम-ओ-दहन का ग़म-ए-मतलूब बनाख़ूब-ओ-ना-ख़ूब बनाहर्फ़-ए-ना-गुफ़्तामगर ज़ेहन का आज़ार बनादिल की दीवार बनाराह-ए-दुश्वार बनाक़िस्सा-ए-शौक़ की वारफ़्ता कहानी न बनाहीला-ए-वस्ल की ग़म-दीदा निशानी न बनावार है मंज़िल-ए-गोयाईसभी जानते हैंहर्फ़-ए-ना-गुफ़्ता के ये ज़ख़्म मगर मेरे हैंजिन को तन्हाई मिरीमुझ से सिवा जानती है
शाह-ए-अवध से फ़ोन पे कल मैं ने बात कीइस्म-ए-गिरामी शाह का अबदुस्सलाम है
कि तेरे साहिलों की नर्म रेत परहुई थीं मेहरबाँ वो उँगलियाँउन्ही की एक पोर ने जो रक़्स इश्क़ में कियाइक इस्म फिर अमर हुआचनाब तेरी रेत परवो इस्म अब कहीं नहींबता वो हाथ क्या हुएवो नक़्श सब हवा हुएवो ख़्वाब सब धुआँ हुएनहीं नहीं ये झूट हैये ख़्वाब है अजीब साअभी भी कुछ नहीं गयामैं चाहती हूँ आँख जब खुले तो नर्म रेत पर मिरा ही एक नाम हो
ये मग़रिब हैयहाँ तहज़ीब हैता'लीम हैअख़्लाक़ हैइंसान में इंसानियत हैयहाँ इंसाँ की क़ीमत हैतमद्दुन हैसक़ाफ़त हैसुकूँ हैअम्न हैऔर आफ़ियत है
मैं मशहूर हो गया हूँअचानक इतना ज़ियादाकि वो लोग मुझे बुरा कहने लगे हैंजो कभी मुझे मिले ही नहींजो मुझे जानते ही नहींमाहेरीन-ए-नफ़सियात कहते हैंग़ैर-हक़ीक़ी दुनिया में रहने वालेजज़्बाती लोगख़ुद को हीरो समझ करजागती आँखों के ख़्वाबों मेंअपनी मर्ज़ी के विलेन तख़्लीक़ कर लेते हैंइस ग़लत-फ़हमी का तअ'ल्लुक़उन के शुऊ'र से नहीं होताउन के आ'माल से नहीं होताउन के शजरे से नहीं होताये एक ज़ेहनी आरिज़ा हैइस लिएमुझे किसी से शिकायत नहींमरीज़ों से हमदर्दी हैऔर थोड़ी सी ख़ुशी भीकि गालियों से कली करने वालेकुछ लोगों कोमेरा नाम ले करतस्कीन मिलने लगी हैमेरा नामइस्म-ए-आज़म बन गया है
ग़रीब लोगो, सितम-गज़ीदा अजीब लोगोतुम्हारी आँखें जो मुंतज़िर हैंकि कोई ईसा-नफ़स तुम्हारेबुरीदा ख़्वाबों की लाश उठा करपढ़ेगा फिर से वो इस्म-ए-आज़मकि जिस से ये ख़्वाब जी उठेंगेग़रीब लोगो, सितम-गज़ीदा अजीब लोगोये जान लो तुम, कि वो पयम्बरदिलों में मौजूद है तुम्हारेतुम अपने बाज़ू कमाँ करोगेतुम अपने सीने सिपर करोगेतो फिर वो ईसा-नफ़स तुम्हारेबुरीदा ख़्वाबों को ज़िंदगी की नवेद देगाअगर यूँही सर झुके रहे तोग़नीम इस बार ख़्वाब क्या हैंतुम्हारी आँखें ही नोच लेगातुम्हारी आँखों में जो शरारे हैंवो शरारे नहीं रहेंगेतुम्हारे प्यारे नहीं रहेंगेग़रीब लोगो, सितम-गज़ीदा अजीब लोगोउठो कि अब वक़्त आ गया है
मेरी महबूब तुझेयाद भी हैं वो लम्हेवो शब-ए-वस्लकि जब ख़्वाब सँवर आए थेइस्म-ए-आज़म की तरहविर्द-ए-ज़बाँ था कोईजैसे आबिद हो मुसल्ले पे ज़बाँ खोले हुएख़ामुशी ऐसी कि जुग बीत गए बोले हुएएक ने एक को पैग़ाम दिया हो जैसेएक ने एक से पैग़ाम लिया हो जैसे
Devoted to the preservation & promotion of Urdu
A Trilingual Treasure of Urdu Words
Online Treasure of Sufi and Sant Poetry
World of Hindi language and literature
The best way to learn Urdu online
Best of Urdu & Hindi Books