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नज़्म
फिसला जो पाँव पगड़ी मुश्किल है फिर संभलनी
जोती गिरी तो वाँ से क्या ताब फिर निकली
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
आसमाँ है आप का ख़ादिम तो लौंडी है ज़मीं
आप ख़ुद रिश्वत के ज़िम्मेदार हैं फ़िदवी नहीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जो और की पगड़ी ले भागे उस का भी ओर उचक्का है
जो और पे चौकी बिठलावे उस पर भी धोंस-धड़क्का है
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
दौलत की आँखों का सुर्मा बनता है हमारी हड्डी से
मंदिर के दिए भी जलते हैं मज़दूर की पिघली चर्बी से