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नज़्म
जब माह अघन का ढलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और हँस हँस पूस सँभलता हो तब देख बहारें जाड़े की
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तराने गूँज उठे हैं फ़ज़ा में शादयानों के
हुआ है इत्र-आगीं ज़र्रा ज़र्रा मुस्कुराता है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
तू और रंग-ए-ग़ाज़ा-ओ-गुलगूना-ओ-शहाब
सोचा भी किस के ख़ून की बनती हैं सुर्ख़ियाँ
जाँ निसार अख़्तर
नज़्म
मुसलामानों के सर पर जब मह-ए-शव्वाल आता है
तो उन की इक़तिसादियात में भौंचाल आता है
सय्यद मोहम्मद जाफ़री
नज़्म
ज़मज़मे का इत्र कैफ़-ए-नग़्मा लय की पुख़्तगी
शोरिश-ए-मय, लग़्ज़िश-ए-मय-नोश, जोश-ए-बे-ख़ुदी
शाद आरफ़ी
नज़्म
डेवढ़ियों पर शादयाने ऐश के बजने लगे
और रंगीं क़ुमक़ुमों से बाम-ओ-दर सजने लगे