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नज़्म
साहिर लुधियानवी
नज़्म
दिन ढला ख़ौफ़ का इफ़रीत मुक़ाबिल आया
या ख़ुदा ये मिरी गर्दान-ए-शब-ओ-रोज़-ओ-सहर
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
डालती होगी तुझे नहला-धुला कर सर में तेल
बाप का दिल खींचता होगा तिरी गुड़ियों का खेल
जोश मलीहाबादी
नज़्म
आग़ोश-ए-वालिदा में पाला था हम को जिस ने
इक पैकर-ए-अदब में ढाला था हम को जिस ने
कैफ़ अहमद सिद्दीकी
नज़्म
मुझ में ऐ यार मिरे कोई कमालात न देख
ख़्वाब वो हूँ जो कभी भी न हक़ीक़त में ढला