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नज़्म
न सहबा हूँ न साक़ी हूँ न मस्ती हूँ न पैमाना
मैं इस मय-ख़ाना-ए-हस्ती में हर शय की हक़ीक़त हूँ
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
आह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीर
आदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ुशनुमा शहरों का बानी राज़-ए-फ़ितरत का सुराग़
ख़ानदान-ए-तेग़-ए-जौहर-दार का चश्म-ओ-चराग़
जोश मलीहाबादी
नज़्म
कह रही है मेरी ख़ामोशी ही अफ़्साना मिरा
कुंज-ए-ख़ल्वत ख़ाना-ए-क़ुदरत है काशाना मिरा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
स्याह-ख़ाना-ए-दुनिया की ज़ुल्मतें हैं दो-रंग
निहाँ है सुब्ह-ए-असीरी में शाम-ए-आज़ादी
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
किसी पर बंद होने का नहीं मय-ख़ाना-ए-उलफ़त
चले आओ खुला रहता है मय-ख़ाना कनहैया का