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नज़्म
स्याने बन कर बात बिगाड़ी ठीक पड़ी सादा सी चाल
छाना दश्त-ए-मोहब्बत कितना आबला-पा मजनूँ की मिसाल
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
'ज़ेहरा' ने बहुत दिन से कुछ भी नहीं लिक्खा है
हालाँकि दर-ईं-अस्ना क्या कुछ नहीं देखा है
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
हमारे दौर-ए-महकूमी की मुद्दत घटती जाती है
ग़ुलामी के ज़माने में इज़ाफ़ा होता जाता है
अली सरदार जाफ़री
नज़्म
मैं खाता हूँ कि ये भी ज़िंदगी की इक ज़रूरत है
मगर हर ज़ाइक़े में एक तल्ख़ी का इज़ाफ़ा है